ब्रह्मलीन महंत श्री दीवान चन्द जी ( फग्गू लाल )

जोड़ी पूजन : ब्रह्मलीन महंत श्री काहन चंद जी से

बाणा पूजा : ब्रह्मलीन श्री रोडा राम जी का 1955 में

24 Sep, 1922 - 5 Jan, 1997

जालंधर में देवी जगदंबा का वास होने के कारण भगवती उपासकों की बहुत संख्या हमेशा मौजूद रही है। खिंगरा गेट के भीतर कुछ कदम की दूरी पर एक वैष्णों मन्दिर है। जहां यह मन्दिर सुशोभित है उस स्थान से भगवती के उपासकों का एक लंबा इतिहास जुड़ा है। यहां एक छोटा सा मकान हुआ करता था जिसमें सन 1880 के करीब भट्ट परिवार रहता था। भट्ट परिवार निस्संतान था पति की मृत्यु के पश्चात माई भरती ने भजन एवं धार्मिक कार्यों के लिए इस स्थान को दान कर दिया था। सन 1934 में यहां पर मोहल्ले के एक भगवती उपासक दीवान चन्द हर शनिवार अपने साथियों के साथ इस स्थान पर आधी रात तक दुर्गा भवानी को संगीतमय आराधना के पुष्प भेंट किया करते थे। 1942 तक दीवान चन्द का नाम भगवती प्रेमी अच्छी प्रकार से जान चुके थे। महन्त काहन चन्द जोकि दीवान चन्द के गुरू भी थे। उनको महन्त परंपरा में प्रवेश करने को कहा तो सन् 1955 में अमृतसर के प्रसिद्ध महन्त हरिकिशन पान्धा ने उन्हें महंत की पदवी दी।

      महंत दीवान चन्द ने भगवती जागरण को घरों के आंगनों से खुले पंडालों में लाने का काम किया था। सन् 1966 में हुए जागरण जालंधर के जगरातों के इतिहास में वह पहला विशाल जागरण थे। जो मन्दिरों और धर्मशालाओं के आंगन से निकलकर खुले पंडाल में हुआ। महन्त दीवान चन्द भगत ध्यानू द्वारा रचित भेंटों को प्रस्तुत करने में माहिर हो चुके थे। झाल, मंजीरे, ढोलक और छैने आदि से जब वे गाते कि ‘उच्चा तेरा मन्दिर मैय्या उते झण्डे’,   ‘भवन पर छैना बाजे’ तो सुनने वाले मस्त हो जाते, घंटों बैठे भेंटें सुनते रहते। महन्त जी अब स्वयं भी भेंटें लिखने लगे थे। जब वे गाते कि ‘बचड़े तो मुखड़ा मोड़ी न’ तो उनकी आँखों से अश्रु धारा ही बहने लगती।

      1983 की बात है प्रसिद्ध सिने स्टार राजकपूर ने दिल्ली के अशोका होटल में भगवती जागरण कराया था। महन्त दीवान चन्द को विशेष तौर पर दिल्ली में भगवती उपासना की परंपरा सुचारू ढंग से निभाने के लिए बुलवाया था। उस जागरण में पहले महन्त दीवान चन्द ने पक्की भेंट प्रस्तुत करके मातारानी का आवाहन किया फिर हीरा लाल हीरा और नरेन्द्र चंचल ने शेरों वाली माँ की भेंटों से सिने जगत से पधारे लोगों को प्रातः पांच बजे तक बैठे रहने पर विवश कर दिया।

      महन्त दीवान चन्द का जन्म एक साधारण परिवार में 1922 को हुआ था। शिक्षा तो बस गुज़ारे लायक ही थी, परन्तु जगत जननी जगदंबे मां के प्रति आस्था कई महान विद्वानों से भी अधिक थी। 1974 में उसी पूजा वाले स्थल पर मन्दिर बनाने का निर्णय हुआ तो महन्त जी ने अपना सारा धन जो भगवती जागरणों से प्राप्त हुआ था मन्दिर का निर्माण करने वाली कमेटी को सौंप दिया। प्रसिद्ध उद्योगपति अमृत सहगल ने शिला न्यास के समय पांच हज़ार रुपये दिये और पावन मूर्तियों एवं प्राण प्रतिष्ठा का सारा खर्च भी उठाया। महन्त जी ने सन 1942 में एक परंपरा और भी आरंभ की थी। विशाल ध्वज़ लेकर माता रानी की जोत के साथ नगर की परिक्रमा करके सावन अष्टमी के दिन चिन्तपूर्णी तीर्थी तक नंगे पांव भजन कीर्तन करते जाना। यह परंपरा उनके बेटे महन्त अश्वनी कुमार और महन्त किशन लाल आज तक निभा रहे हैं। महन्त दीवान चन्द का देहावसान सन 1997 को हुआ। आज पंजाब में पांच सौ से अधिक भजन और भेंट गायक हैं। जब भी जगरातों का मौसम आता है महन्त दीवान चन्द, महन्त काहन चंद, महन्त निरंजन दास जैसे साधकों की याद बर्बस ही आ जाती है।

– दीपक जालंधरी

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जानने योग्य तथ्य

1934 में भजन करना शुरू किया।
हर साल सावन की 14 वीं को जागरण करना शुरू किया।
1942 में पहला जागरण किया।
1966 में 25 वां जागरण किया।
1991 में 50 वां जागरण दो रात लगातार किया।
उनके बाद 2016 में शिष्यों ने 75 वां जागरण वो भी दो रात का किया।
इस जागरण की परम्परा आज भी निभाई जा रही है।

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